टाँबर सिंह चौहान की जीवनी: आपातकाल के सच्चे योद्धा और कुल्लू के गर्व
टाँबर सिंह चौहान कुल्लू उपमंडल के अंतर्गत ग्राम पंचायत कटराईं के जतेहड़ गाँव के निवासी हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े एक समर्पित कार्यकर्ता और कट्टर राष्ट्रवादी के रूप में जाने जाते हैं। मात्र 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने 1975 के आपातकाल के समय अपनी जान, करियर और भविष्य की परवाह किए बिना लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
इस ब्लॉग पोस्ट में हम टाँबर सिंह चौहान के जीवन, उनके आपातकाल के संघर्ष, जेल में बिताए गए दिनों और आज के उनके शांत लेकिन गौरवपूर्ण जीवन के बारे में विस्तार से जानेंगे।
टाँबर सिंह चौहान – संक्षिप्त परिचय
- पूरा नाम: टाँबर सिंह चौहान
- जन्म स्थान: गांव जतेहड़, ग्राम पंचायत कटराईं, उपमंडल कुल्लू
- मुख्य पहचान: राष्ट्रभक्त, आरएसएस कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता
- वर्तमान आयु: लगभग 72 वर्ष
- वर्तमान कार्य: बागवान (हॉर्टिकल्चर/बागवानी)
- परिवार: पत्नी – श्रीमती माया चौहान, पुत्र – अधिवक्ता श्री विजेंद्र सिंह चौहान
आपातकाल के समय उनकी भूमिका – मुख्य बिंदु
- सिर्फ 22 वर्ष की आयु में आपातकाल विरोधी आंदोलन में सक्रिय हिस्सा
- आरएसएस शिविर, वैश्य कॉलेज, रोहतक से जुड़े रहे
- कुल्लू में भारतीय जनसंघ और आरएसएस नेताओं के साथ सत्याग्रह में भागीदारी
- कुल्लू पुलिस स्टेशन में 11 दिन पुलिस हिरासत
- डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (DIR) के तहत लगभग 1 माह न्यायिक हिरासत
- जेल की खराब स्थिति व बीमारी के बावजूद हिम्मत नहीं हारी
शुरुआती जीवन और राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़ाव
टाँबर सिंह चौहान का पालन-पोषण हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र की शांत, धार्मिक और राष्ट्रप्रेम से भरी संस्कृति के बीच हुआ। बचपन से ही वे राष्ट्रीय मुद्दों, समाज सेवा और संगठनात्मक जीवन की ओर आकर्षित रहे। इन्हीं मूल्यों ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा से जोड़ा, जो अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और समाज सेवा पर आधारित है।
युवा उम्र में ही वे आरएसएस की शाखाओं और शिविरों में सक्रिय भाग लेने लगे। यह वही समय था जब देश में राजनीतिक हलचल तेज हो रही थी और लोकतंत्र के भविष्य पर प्रश्नचिह्न उठने लगे थे।
आपातकाल 1975 और टाँबर सिंह चौहान की साहसिक भूमिका
वर्ष 1975 में जब देश पर आपातकाल थोपा गया, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय बन गया। उसी दौरान टाँबर सिंह चौहान हरियाणा के रोहतक स्थित वैश्य कॉलेज में आयोजित एक माह के आरएसएस प्रशिक्षण शिविर में भाग ले रहे थे।
आपातकाल घोषित होने के बाद, संघ पर प्रतिबंध लगा और यह शिविर लगभग पाँच दिन पहले ही समाप्त करना पड़ा। सामान्य युवाओं के लिए यह डरने और पीछे हटने का समय हो सकता था, लेकिन टाँबर सिंह जैसे राष्ट्रभक्तों के लिए यह संघर्ष का नया अध्याय था।
कुल्लू में सत्याग्रह और गिरफ्तारी
शिविर के अचानक समाप्त होने के बाद टाँबर सिंह चौहान कुल्लू लौट आए। यहाँ उन्होंने भारतीय जनसंघ और आरएसएस के अन्य साथियों के साथ मिलकर आपातकाल के विरोध में सत्याग्रह शुरू किया। उनका मानना था कि आपातकाल केवल राजनीतिक फैसले भर नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक आत्मा पर चोट था।
सत्याग्रह के दौरान वे खुलकर आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाते रहे, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह गिरफ्तारी सिर्फ एक व्यक्ति को चुप कराने की नहीं, बल्कि विचारों और स्वतंत्रता को कुचलने की कोशिश थी – लेकिन टाँबर सिंह ने हार नहीं मानी।
कुल्लू पुलिस स्टेशन में 11 दिन का कड़ा पुलिस लॉकअप
गिरफ्तारी के बाद टाँबर सिंह चौहान को कुल्लू पुलिस स्टेशन में लगातार 11 दिनों तक पुलिस लॉकअप में रखा गया। इस दौरान उनसे घंटों पूछताछ की जाती, कई बार अमानवीय और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले सवाल पूछे जाते।
लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों और विचारों से समझौता नहीं किया। उनका यह दृढ़ निश्चय था कि यदि देशहित और लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल भी जाना पड़े तो यह बलिदान छोटा है।
न्यायिक हिरासत और जेल की कठिन परिस्थितियाँ
पुलिस हिरासत के बाद उन्हें डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (DIR) के तहत न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, जहाँ उन्हें लगभग एक महीने तक जेल में रहना पड़ा। इस दौरान जेल की स्थिति अत्यंत खराब थी – न भोजन की अच्छी व्यवस्था, न साफ-सफाई और न ही स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ।
टाँबर सिंह और उनके साथ बंद अन्य कार्यकर्ताओं को निम्न स्तर की गुणवत्ता वाला भोजन दिया जाता था। नतीजतन कई लोग संक्रामक बीमारियों से पीड़ित हो गए और उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ा। टाँबर सिंह चौहान स्वयं भी बीमारी और कमजोरी से गुजरते रहे, लेकिन मानसिक रूप से वे पहले की तरह ही मजबूत बने रहे।
वे स्वयं याद करते हैं कि अंदर की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि उन्हें कभी-कभी यह भी विश्वास नहीं रहता था कि वे बाहर आ पाएँगे। इसके बावजूद उन्होंने अपने विचारों, राष्ट्रभक्ति और सत्याग्रह की भावना से समझौता नहीं किया।
साथी कैदी: भविष्य के नेता और आंदोलन की विरासत
टाँबर सिंह चौहान के साथ जेल में कई अन्य प्रमुख नेता भी बंद थे, जिनमें –
- स्वर्गीय कुंज लाल ठाकुर – जो बाद में हिमाचल प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।
- श्री चंदर सेन ठाकुर – जो आगे चलकर कुल्लू विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने।
ये सभी लोग उस दौर के संघर्ष, राष्ट्रनिष्ठा और लोकतंत्र बचाने की जद्दोजहद के साक्षी रहे। टाँबर सिंह चौहान का नाम भी इन्हीं लोगों की पंक्ति में सम्मान के साथ लिया जाता है।
आज का जीवन: एक संतुष्ट बागवान, फिर भी उतनी ही मजबूत राष्ट्रभक्ति
आज टाँबर सिंह चौहान लगभग 72 वर्ष की आयु में एक संतुष्ट बागवान के रूप में जीवन जी रहे हैं। वे सेब, अन्य फलों और बागवानी से जुड़े कार्यों में व्यस्त रहते हैं। उनके साथ उनकी धर्मपत्नी श्रीमती माया चौहान और अधिवक्ता पुत्र श्री विजेंद्र सिंह चौहान हैं, जो उन्हें मानसिक सहारा और गर्व की अनुभूति कराते हैं।
संघर्ष से भरा हुआ अतीत हो, जेल की कठिनाइयाँ हों या कमजोरी और बीमारी के दिन – इन सबके बावजूद आज भी टाँबर सिंह चौहान का हृदय उसी तरह राष्ट्रभक्ति और समाज सेवा से भरा हुआ है।
क्यों याद रखना ज़रूरी है टाँबर सिंह चौहान जैसे गुमनाम नायकों को?
आज की पीढ़ी आपातकाल को किताबों, इंटरनेट और लेखों के माध्यम से जानती है, लेकिन उन दिनों को जिया किसने – यह जानना भी उतना ही जरूरी है। टाँबर सिंह चौहान जैसे कार्यकर्ता वे लोग हैं, जिन्हें शायद बड़े मंच न मिले हों, लेकिन जिनके संघर्ष ने लोकतंत्र को जिंदा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ऐसे गुमनाम नायकों की कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि–
- सही के लिए खड़े होना हमेशा आसान नहीं होता,
- लेकिन एक सच्चा राष्ट्रभक्त वही है जो डर के बावजूद पीछे न हटे,
- और जो व्यक्तिगत नुकसान झेलकर भी देश और समाज के लिए खड़ा रहे।
टाँबर सिंह चौहान की जीवन यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी और नागरिक अधिकार यूँ ही नहीं मिले – इन्हें पाने और बचाने के लिए अनेक लोगों ने अपने जीवन के कीमती वर्ष संघर्ष में लगा दिए।
समापन: एक प्रेरणास्रोत जीवन, जो हमेशा रोशनी दिखाएगा
टाँबर सिंह चौहान का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं – एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से उठकर राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनना, आपातकाल के दौरान जेल और बीमारी झेलना, और आज शांत, सरल बागवान के रूप में जीवन जीते हुए भी भीतर से उतने ही मजबूत राष्ट्रभक्त बने रहना।
उनका जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है कि चाहे समय कितना भी कठिन क्यों न हो, सिद्धांतों से समझौता किए बिना भी जीवन जिया जा सकता है और सच्चा सम्मान वही पाता है जो सही के लिए डटकर खड़ा होता है।

